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Swapna Sadhankar

Classics

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Swapna Sadhankar

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जलन-ए-जिगर

जलन-ए-जिगर

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शायद मरते दम तक, ये मायूसी पीछा छोड़ेगी नहीं,

मोहब्बत की इनायत मेरी तक़दीर में लिखी ही नहीं।


कितना कमज़र्फ़ बना दिया है, इस जिगर की जलन ने,

ज़ख़्म-ए-तन्हाई को ठंडक, शराफ़त से मिली ही नहीं।


फड़फड़ाती रहती है कमबख़्त, एक चिंगारी सीने में,

बुझा सके ऐसी बारिश, कभी आँखों से गिरी ही नहीं।


मुसलसल उठता रहता है, क़ातिलाना धुआँ रग-रग में,

इस धुँधले सफ़र में, कोई रात सुकून से बीती ही नहीं।


कहीं गुमनाम न हो जाए पहचान, ख़ुदगर्ज़ी के अँधेरे में,

आतिश-ए-ख़ामोश की आह, उजाले में चीखी ही नहीं।


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