सहारा-ए-दिल-ए-नाशाद
सहारा-ए-दिल-ए-नाशाद
तनहा रातों में, तुम्हारे ख़्वाबों का सहारा मिल जाता है,
मेरी वीरानियत के अँधेरों में, जैसे उजाला मिल जाता है।
तुम्हारी यादों की चादर ओढ़े, सिमट जाता हूँ ख़्यालों के बिस्तर में,
मेरी मायूसियत की सिहरन पर, मानो दुशाला मिल जाता है।
तुम्हारा पेहम ज़िक्र भी काफ़ी है, सूखे जज़्बातों के मयख़ाने में,
मेरे तरसते अरमानों को, तसकीन का प्याला मिल जाता है।
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*स्वप्ना*
