तबतक करूंगी इंतजार तेरा
तबतक करूंगी इंतजार तेरा
तबत क करूंगी इंतजार तेरा !
जब तक तुम मुसाफ़िर बनके
अपनी मंजिल को पा न जाओ !
जब तक तुम राहगीर बनके
मेरे पास आ न जाओ !
तबतक तकूँगी राह तुम्हारा।
बहुत दिन हो जाएंगें ,जब !
आने की तेरी कोई खबर न मिलेगी,
तब ! तब तुझे ढूंढते हुए
खुद तेरे पास चली आऊँगी।
बिछड़कर मैं तुझसे अब
एक पल भी जी न पाऊँगी।
तुम पे ही टिकी है जिंदगी मेरी,
तुझे हर हाल में हकीक़त अपना बनाऊँगी।
मिलने की चाहत हमें भी बहुत है !
मगर हम दुनिया के बंधनों में बंधी
तड़प-तड़प कर जी रही।
हम भी हालतों के आगे मजबूर हैं, हम !
तेरे दिल में रहकर भी तुझसे दूर हैं हम
विरहनियों की जिंदगी जी रही मैं।
हर जगह याद तुम आते हो,
मेरे ख्यालों, ख्वाबों में आकर
दुल्हन के रूप में मुझे सजाते हो।
मैं भी उस पल की प्रतीक्षा में
आस लगाएँ बैठी हूँ,
जब तेरी गोद में सोकर
सुकून की नींद पाऊँगी।
कब हमारी दुनिया अलग बसेगी ?
मैं उसी सपने को साकार
करने की हर पल सोचती हूँ।
जब तुम बहुत देर लगाओगे आने में,
मैं खुद भागी- दौड़ी चली आऊँगी।
पाकर अपनी चाहत को ही मैं
राहत की साँस ले पाऊँगी।
मैं तेरी हूँ, तेरी बनके ही
जिंदगी अपनी बिताऊँगी।

