संगेमरमर
संगेमरमर
संगेमरमर की ख़ामोशियाँ कुछ कहती हैं,
बीते हुए एहसासों की दास्ताँ रहती हैं।
हर नक़्श में कोई अरमान ठहरा होगा,
हर मोड़ पर कोई इंतज़ार ठहरा होगा।
चाँदनी जब इसकी देहलीज़ पर उतरती है,
पुरानी मोहब्बत फिर आँखें भरती है।
ढूँढ़ती हैं नज़रें वही पाक अफ़साने,
जो लिख गए थे दिलों ने वक़्त के बहाने।
अब न वो क़समें हैं, न वैसी वफ़ाएँ हैं,
सिर्फ़ पत्थरों में क़ैद कुछ सदाएँ हैं।
कितने ही मौसम इसकी चौखट से गुज़रे,
कितने ही ख़्वाब बनकर धूल में बिखरे।
फिर भी ये उम्मीद का दिया जलाए है,
किसी सच्चे प्रेमी की राह तकाए है।
कि कोई फिर मोहब्बत को अमर कर जाए,
संगेमरमर में धड़कता दिल भर जाए।
और फिर किसी प्रेम की ऐसी मिसाल बने,
कि फ़लक भी झुके, ज़मीं भी निहाल बने।

