समय!
समय!
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वक़्त
समय दरिया बन बहता,
कभी रेत सा ढल जाता है,
मुट्ठी में कैद करो जितना,
उतना ही फिसल जाता है।
कभी धूप बन राहें चमकाए,
कभी छाँव में ठहराता है,
जो इसके संग चलना सीखें,
उन्हें मुकाम दिलाता है।
कल का सपना, बीती यादें,
सब इसकी सौगातें हैं,
जो पल को जीना जान गए,
उनकी ही जीतें हैं।
