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NOOTAN KUMARI

Tragedy

4  

NOOTAN KUMARI

Tragedy

रहने दो!

रहने दो!

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अब और क्या तलाश करें इन फ़सानों में,
जो था भी अपना, खो गया ज़माने में।

कितनी ही बार दिल ने आवाज़ दी उन्हें,
गूँज ही लौटी हर बार वीराने में।

रिश्तों की शाख़ पर जो भरोसे खिले थे,
झर गए चुपचाप मौसम बदल जाने में।

कौन किसका है, ये समझ आ ही गया,
उम्र बीत गई बस यही जानने में।

हर चेहरे पर एक अधूरी सी कहानी है,
हर मुस्कान उलझी है किसी बहाने में।

वक़्त ने ऐसे भी कई सबक़ लिखे,
जो न आए कभी किसी किताबख़ाने में।

अब न कोई गिला है, न कोई सवाल,
क्या रखा है हर बात को दोहराने में।

जो बीत गया, उसे बीत ही जाने दो,
दिल ने फिर कहा — चलो, अब रहने दो।


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