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NOOTAN KUMARI

Thriller

4  

NOOTAN KUMARI

Thriller

दस्तक!

दस्तक!

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दस्तक

कौन है जो ख़ामोशी में, नाम मेरा पुकार रहा है, 

बंद पड़े एहसासों के दर पर, धीरे-धीरे उतर रहा है।


सालों से जो धूल जमी थी, यादों की उस चौखट पर, 

एक हवा सी चल पड़ी है, अनकहे से किसी सफ़र पर।


न दर्द की वह परछाईं है, न कोई पुराना अफ़साना, 

फिर भी दिल के सूने कमरे में, लगता है कोई है आना।


थके हुए इन ख़्वाबों को भी, फिर से रंग दिखाई देते, 

सूखे पत्तों वाले मौसम में, कुछ फूल नए खिलते रहते।


शायद कोई उम्मीद नई है, या फिर कोई अपना सा पल,

 जो चुपके से आकर कहता— मत होना तुम यूँ विफल।


दरवाज़ा अब खुला हुआ है, जो आना हो, आ जाने दो, 

इस दिल की वीरान गली में, एक नई दस्तक आने दो।


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