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Arun Gondhali

Tragedy Classics Others

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Arun Gondhali

Tragedy Classics Others

स्याही का गिला

स्याही का गिला

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स्याही का गिला


मुझे भी शामिल करो अपने बयानों में,

कुछ तारीफ मेरी भी हो महफ़िल-ए मुशायरोंमें,

कह कर स्याही रूठी है अंदाज-ए-कलमसे,

इजहार-ए-खयाल रुक गया झमेलों में ।



शायर का जवाब


वाकिफ़ हूं तेरे जज़्बात जो दवात में घूँट रहे है,

वोही तेरा जमीं से आसमाँ तक आला मक़ाम है ,

हर शायर की तू मुराद है सफर-ए-मुस्तकबिल है, 

वरना कहाँ महफिले सजतीं तू ही वीराने में जान है  ।



आख़िरी इज़हार 


तू न उतरती काग़ज़ पर तो अशआ'र कहा होते,

तरन्नुम की बंदिश के घराने कहाँ होते,

ए मक़तूल-ए-जिगर, तुझसे ही बयां हूँ मैं जमाने में ,

शायर तो होते, पर  महफ़िल-ए-बाज़ार कहाँ होते ।


अरुण गोंधली, आग (२५.०९.२०२६)






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