बिदाई एक पीढ़ीकी
बिदाई एक पीढ़ीकी
बिदाई एक पीढ़ीकी
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कुछ ही दिन महीने साल बचे है
एक पीढ़ी बिदा हो जाएगी
जो खुशी और ग़म को मात देती है ।
मेहमानों को आमंत्रित करती है
स्वागत शान से करती है
बागीचे उनके बच्चे जैसे
हर बच्चे को प्रेम करती है ।
पूजा और मंदिर जीवनका एक अंग
विश्वास श्रद्धा के दुनिया पर अड़े
दोस्तों के साथ हमेशा खड़े ।
बहोत कुछ कहने को रह जाता है ।
सायकल से लेकर विमान चलाए
मोबाइल लैपटॉप भी अपनाए
बहोत कुछ देखा, कहा सुना
दुनियाके हज़ारों रंग देखें है
फॉक से लेकर रैप पर झूमे है ।
राष्ट्र को सर्वोपरि वो मानते है
गद्दारो को खूब अब पहचानते है
फिर भी सबको बंधु कहते है
वसुदेव कुटुम्बकम् की मनसा है ।
बिदाई की घड़ियाँकी शुरुआत को
सलाम करते है,
इस भारतीय युवक को नमन करते है ।
- अरुण गोंधली (२१.०८.२०२६)
