सवाल जवाब
सवाल जवाब
इतने ज़्यादा सवाल और इतने ज़्यादा ही जवाब क्यों?
बार बार हर चीज़ का गिन गिन के ही हिसाब क्यों?
हक़ीक़त न हों कभी, बार बार ऐसे ही ख़्वाब क्यों?
सीने में दिल और उस का भी दर्द बेहिसाब क्यों?
अब तो जीना है तुझे हृदय अपना अब विशाल कर,
हर चुनौती पार कर के कुछ नया अब कमाल कर,
जवाब न दे पाए कोई भी ऐसा ही बस सवाल बन,
वक़्त ही बन जाए हर जवाब ऐसा अब बवाल बन।
बहुत काट चुके अन्धेरे, चरागों के लिए तू मिसाल बन,
चरागों की रोशनी फीकी पड़ जाए, ऐसी मशाल बन,
हो चुका जो पहले कभी, उस का न अब तू मलाल कर,
अब करना है जो ठीक से उस का बस ख़्याल कर।
सवाल जवाब की दुनिया से निकल कुछ नवीन कर,
समाज से निकल तू हर जगह अपनी ही ज़मीन कर,
हिसाब सब फीके पड़ जायें, खुद को इतना प्रवीण कर,
हौसलों को ऊँचा कर ज़मीन पे सितारों की उड़ान भर।
खुशी ग़म का अन्तर मिटा ज़मीन आसमान एक कर,
ज़िन्दगी और मौत को मिला दे दुख दर्द सब समेट कर,
हर ख़्वाब से ही हक़ीक़त होने का आभास हो जाए,
निराशा को दूर भगा बार बार ऐसा कर्म प्रत्येक कर।
इतने ज़्यादा सवाल और इतने ज़्यादा ही जवाब क्यों?
बार बार हर चीज़ का गिन गिन के ही हिसाब क्यों?
हक़ीक़त न हों कभी, बार बार ऐसे ही ख़्वाब क्यों?
सीने में दिल और उस का भी दर्द बेहिसाब क्यों?
