सुरों में बसी चांदनी।।
सुरों में बसी चांदनी।।
शीर्षक: "तेरे सुरों में बसी चाँदनी"
तेरे स्वर में है संगीत प्रेम की,
मन को छू जाए मीठी प्रीत।
बादल बोले बादलों में,
तेरी यादें हर पहर में।
तू मुस्काए,
रिमझिम साज बजे,
मन के भीतर एक
मीठी तान सजे।
ओ तेरे सुर में बसी चाँदनी,
हर धड़कन तुझसे जुड़ी हैं कहीं।
छू ले तू ऐसे ख़ामोशी को,
जैसे बूँदें छूती हैं ज़मीं को।
तेरी आँखें, चाँद का जल,
ठंडी रातों में सौंधा पल।
तू रागिनी, तू ही सवेरे का रंग,
दिल में बसी तेरी मीठी तरंग।
थामे रहूँ मैं तेरा हाथ,
जीवन में रहे
तेरा ही साथ ।
ओ तेरे सुर में बसी चाँदनी,
हर धड़कन तुझसे जुड़ी कहीं।
छू ले तू ऐसे ख़ामोशी को,
जैसे बूँदें छूती हैं ज़मीं को।
तू कह दे बस "पास रहो",
मैं ख़ुद को तुझमें बहने दूँ।
जीवन की हर एक रेखा में,
तेरा ही नाम लिख दूँ।
सपनों में भी तेरा साज बजे,
हर राग तुझसे सज-धज के बहे।
ओ मेरी धुन, ओ मेरी धारा
तू ही रात, तू ही मेरा सवेरा।
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।

