सुनो कोरोना
सुनो कोरोना
सुनो कोरोना
अपनी तुम ख़ूब कह चुके
अब हमारी भी सुनो ना !
बिन बुलाए तुम भीतर तक
घुस आए,
हम ही कुछ गाफिल थे
आहट पहचान नहीं पाए।
एक घर, फ़िर दूसरा
फ़िर तीसरा
अपने पंख तुम पसारते गए
हर दूसरे पर
हुकूमत जमाते गए।
हम
कुछ घबराए,
छूटने को कसमसाए भी
तुम तो जैसे हाथ धो कर पीछे पड़ गए,
हम भी तो
हाथ धो कर-
तुम्हें पछाड़ते गए।
हां कोरोना-
तुम कई मामलों में हमसे आगे रहे;
ढूंढे न मिलो ऐसे छिपते रहे,
हम अटकलें लगाते रहे
आंकड़े गिनते रहे-
और तुम वार पर वार करते रहे।
मौत का खेल
तुमने शुरू किया है,
तुम्हारे लिए तो बाएं हाथ की बाज़ी है।
हां-
इस वक्त हम कुछ परेशान हैं,
हालात के मारे हैं;
तुमसे छुटकारा पाने का
कोई सही हल भी हम ढूंढ नहीं पाए हैं।
यही पूछते आए हैं
'अतिथि तुम कब जाओगे'
किंतु कोरोना-
अब और नहीं।
आदमी की ज़िद के आगे तो
ईश्वर भी झुकता आया है;
फ़िर तुम किस खेत की मूली हो ?
आज नहीं तो कल
उखाड़ कर फेंक ही दिए जाओगे।
अब कोरोना
अपनी ख़ैर मनाओ
बस हुज्जत तो अब करो ना।
