STORYMIRROR

Dr. Anu Somayajula

Abstract

3  

Dr. Anu Somayajula

Abstract

पैसों का पेड़

पैसों का पेड़

1 min
503

आंगन के कोने में

सिक्का बोया था छुटपन में

हम बच्चों ने

रोज़ डालते पानी

देखा करते आतुरता से

अब फूटेगी, कब फूटेगी कोंपल

कब सिक्के लटकेंगे 

पत्ते बन कर

कोंपल ना फूटी, दिन पर दिन बीते।


छोटी सी इक टहनी रखी

सिक्कों वाली बोतल में

रोज़ - रोज़ देखा करते

फूटती नन्ही, नाज़ुक जड़ों को 

सोचा करते

जड़ें सिक्के बन जाएंगी

बोतल सिक्कों से भर जाएगी

कुछ ना होना था न हुआ।


बो आए टहनी को

फ़िर से आंगन के कोने में 

टहनी तो पेड़ बनी

ना नोटों के पत्ते लटके

ना सिक्कों के फल - फूल उगै

पत्ते रहे 

पत्तों की ही सूरत में।


पैसे के पेड़ों की

इच्छा

बस इच्छा ही रही

नोटों की सूरत झरते पत्तों की

सपने में भरमार रही।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract