अनजान सफर
अनजान सफर
चलते वक्त उसने
मेरी जेबों के तहखानों
मे कविता के चंद पुर्जे
रख दिए
ये कहकर तुम
तब गाना इन्हें प्रार्थनाओं में
जब किसी अनजान सफर पर रहो।
पिछले तीन सालों से
मैं रोज कविताओं को
छाती से ह्रदय निकाल कर गाता हूॅ
चर्च में , मंदिरों में
सब जगह सिर्फ यही
लय बद्ध होकर गाता हूॅं
पर सफर बिना मनसूबे के
ही रहता है।
मैं जोर जोर से क्रंदन
कर कविताओं के माथे को
चूमता हूॅ
मैं कविताओं से प्रेम
कर सिसकियां भरता हूॅं
पर सफर मन्तव्य को
परिभाषाओं में परिवर्तित नहीं करता।
मैं तुमसे प्रेम में था
ये जानते हुए कि
तुम एक धुंध हो
जिसे वक्त की गर्मी
कहीं ठहरने न देगी
पर मेरा प्यार और ये धुंध
कविताओं के गाने पर भी नहीं पिघलते
मैं अनजान सफर पर हूॅं
और ये कविताएं
मेरे बीते कल में
पड़े एक गुलाब की याद दिलाती है
जो आज भी तुम्हारे एक बोसे के इन्तजार में
तुम्हारी दी कविताओं के पास पड़ा है।

