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sunil saxena

Romance

4  

sunil saxena

Romance

निक्टर

निक्टर

3 mins
417


सूरज की पहली किरणों में जैसी चमकी

हुई ओस की झलकती बूँद , खिले हुए कमलगुलाब पे

कमलगुलाब की पंखुड़ियों , अपनी वासना के पंख फैलाती हुई

ज्वालामुखी की उठती हुई , वासना के सागर के धुंध में से

गेंदे के फूलों की जैसी , निक्टर ,

कमलगुलाब की सुलगती हुई ,

स्वर्ग के दरवाजे से बहती हुई वासना के सागर की महक

प्रेमरस बहता हुआ निक्टर के ऊपर से , जैसा अमृत की महक , 

दिव्य फूलों की घाटी में

निक्टर लाल सुर्ख होती हुई , रंगरसिया के कोमल वासना के स्पर्श से!

वासना के सागर में लिपटी हुई , उमड़ती हुई ,

निक्टर की कली , वासना की लहरों में बहती हुई

निक्टर पे , चमकती हुई प्रेमरस के अमृत की बूँद

वासना सागर के तूफान में जैसे उठती हुई लहरें 

रंगरसिया के वासना लिपत कोमल होठों के स्पर्श

से और रंगरसिया की जीभ से होले होले प्रेमवासना

के स्पर्श से अंगड़ाई लेती हुई प्रेमवासना के मिलन में डुबी हुई निक्टर

निक्टर उठती हुई सुलगती हुई कमलगुलाब की खीली हुई पंखुड़ियों में से

डुबी हुई , बहती हुई , प्रेमरस के अमृत में

झूलती हुई प्रेमवासना के जाल की महक में

बुलाती हुई अपने पास , 

रंगरसिया की नटखट जीभ के नशे में चूर होना चाहती हुई

रंगरसिया के प्रेमवासना में लिपत नटखट होठों और जीभ

के कोमल बंधन में जकड़ी रहना चाहती हुई , सुबह से शाम तक

निक्टर ले रही है अंगड़ाई यूनिकर्न के सींग की तरह

स्वर्ग के दरवाजे के बगीचे में

उमड़ रही हैं उसकी वासना में लिपत आहें 

रंगरसिया के वासनाअश्वमेध पे हो के प्रेमरस में डूबने की

निक्टर झूल रही है कोमल फूल की भांति ,

मस्त प्रेमवासना की पवन में

रंगरसिया के वासनाअश्वमेध के नटखट लड़कपन पे

जो खिल उठे वासना के फूलों की अंगड़ाई में

फ़ैलाता हुआ अपनी महक स्वर्ग के दरवाजे की घाटी में

निक्टर बहकती हुई मस्त आनंद में

कमलगुलाब की सुलगती हुई सुर्ख खिलती हुई पंखुड़ियों को

डूबने में विवश करती हुई प्रेमरस में बहती हुई बलखाते सागर में

प्रेमवासना की सुनामी में धकेलते हुए , निक्टर झूल रही है

अपनी कैद में लेती हुई रंगरसिया के वासनाअश्वमेध को

भिगोती हुई उसे अपनी कमलगुलाब की गहराईयों में

से झरने की तरह बहती हुई शीतल प्रेमरस में

निक्टर निकलती हुई अपनी कोकून में से तितली की भांति

कमलगुलाब की खिली हुई पंखुड़ियों में से  

रंगरसिया के नम होंठों के स्पर्श के लिए तड़पती हुई

निक्टर मदहोश करती हुई रंगरसिया की प्रेमवासना को

अपनी सागर के समान बहती हुई प्रेमरस को

उसकी सुगंध को वासना में आनंद से डूबोती हुई

निक्टर खिलखिला रही है रंगरसिया की जीभ की होले-होले

मरहम लगाने जैसी प्रेमवासना में लिप्त जैसे स्पर्श को

निक्टर मुस्कुराती हुई ले रही है वासना की अंगड़ाई

होती हुई सुर्ख लाल , प्रेमवासना में लिप्त स्वर्ग के दरवाजे

पे खिली हुई कमलगुलाब की प्रेमरस में डूबी पंखुड़ियों

के मिलन में खेल रही है वासना की छुपन छुपाई

हवा में बहती हुई प्रेमरस की सुगंध

झील सी शीतल बहती हुई कमलगुलाब की खिली हुई सुर्ख पंखुड़ियों से

गीली करती हुई रंगरसिया के वासना लिप्त होंठों को

मदहोश करती हुई रंगरसिया के वासनाअश्वमेध के होशो को ,फूलों की घाटी में

हर वासनाअश्वमेध जो अपने मस्त भाव में अपने दो पैरों पे

खड़ा हो कर हिनहिनाता है ,

फूलों की घाटी में खिलती हुई हर कली के लिए

केवल निक्टर की प्रेमवासना की घाटी में सवार होने के लिए

निक्टर प्रेमवासना की दिव्य कली है

कमलगुलाब की सुलगती हुई खिली हुई पंखुड़ियों की बाँहों में

निक्टर शान है भड़कती हुई बहती हुई प्रेमवासना से लिप्त

प्रेमरस की महकती हुई स्वर्ग के दरवाजे की झील

जो रंगरसिया के वासनाअश्वमेध को मदहोश कर के

अपनी बाँहों में लेले और रंगरसिया उसे अपने होंठों

के प्रेमवासना के स्पर्श में डुबोले , बहकाले 

निक्टर , कमलगुलाब की दिव्य कली 

स्वर्ग का दरवाजा , कमलगुलाब , निक्टर

तुम स्त्री हो तुम दिव्य हो

तुम स्त्री हो!


 


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