Neelam Chawla
Abstract
हमने कई कवितायेँ
हाथों में पकड़ी
माथे पर पकड़ी
पर दिल पर न रख सके।
और जो कविताऍं दिल पर
रखी गई
वो खुद ब खुद
माथे और हाथो में ठहर गई।
रखी गई कविता
यादें
हरी रंग की मु...
उस दिन जब
हुंकार
नापसंद
प्रेम
लाकॅ डाऊन
पुरुष जो स्त...
मेरी चिड़िया
फलों और फूलों सहित ऋतुराज सबको मनभावन नजर आता। फलों और फूलों सहित ऋतुराज सबको मनभावन नजर आता।
ना रही घर की, ना घाट की,उनके लिए थी, वो काले पाणी कि सजा अंदबार-निकोबार की। ना रही घर की, ना घाट की,उनके लिए थी, वो काले पाणी कि सजा अंदबार-निकोबार की।
आइए! हिमालय के दर्शन करता हूँ उसकी विशालता को नमन करता हूँ। आइए! हिमालय के दर्शन करता हूँ उसकी विशालता को नमन करता हूँ।
जुड़े हैं तुम्हारी मुस्कान से एक अदद हंसी से हमको भी अब हंसने दो। जुड़े हैं तुम्हारी मुस्कान से एक अदद हंसी से हमको भी अब हंसने दो।
शाम सवेरे तुम तो बस खुद में ही खोई रहती हो। शाम सवेरे तुम तो बस खुद में ही खोई रहती हो।
आप सबकी कविताओं को पढ़ कर मन हर्षाते है। आप सबकी कविताओं को पढ़ कर मन हर्षाते है।
तुम्हें बता रहा हूँ, जीवन अनमोल जिसमे में अनेक हूँ। तुम्हें बता रहा हूँ, जीवन अनमोल जिसमे में अनेक हूँ।
मेथल हाइड्रा जीन, द्रवित, हाइड्रोजन काम में आता।। मेथल हाइड्रा जीन, द्रवित, हाइड्रोजन काम में आता।।
बसंत पंचमी पर्व की सभी को दिल से बधाई। लेखन के इस महाकुंभ से लेते सस्नेह विदाई।। बसंत पंचमी पर्व की सभी को दिल से बधाई। लेखन के इस महाकुंभ से लेते सस्नेह विदा...
माता-पिता की खुशी औलाद की तरक्की में। औलाद की खुशी माता पिता की मुस्कान में। माता-पिता की खुशी औलाद की तरक्की में। औलाद की खुशी माता पिता की मुस्कान में।
कोई बात दिल में थी मगर मैं कह ना सका भावनाओं का बवंडर था जो बहते बहते बह ना सका। कोई बात दिल में थी मगर मैं कह ना सका भावनाओं का बवंडर था जो बहते बहते बह ना स...
अब कुछ और खोने का डर नही, जो कभी कहने को था मेरा। अब कुछ और खोने का डर नही, जो कभी कहने को था मेरा।
पल पल चाहत यही है रहती आई ऋतु वसंत की। पल पल चाहत यही है रहती आई ऋतु वसंत की।
आपको पलकों पर बिठाने को दिल करता है। पिता जी को बहुत स्नेह, प्यार, सम्मान। आपको पलकों पर बिठाने को दिल करता है। पिता जी को बहुत स्नेह, प्यार, सम्मान।
हां तुम खुदा ना सही, पर कम उससे बिलकुल भी नहीं हां तुम खुदा ना सही, पर कम उससे बिलकुल भी नहीं
इसी माया के लिए तो नफ़रत करता है इंसान से इंसान, इसी माया के लिए तो नफ़रत करता है इंसान से इंसान,
दुःख हरनी सब मंगल करनी। वसुधा धरा भूमि भू अवनी। दुःख हरनी सब मंगल करनी। वसुधा धरा भूमि भू अवनी।
हमारे अपने विचार हैं हमारी अपनी सोच है। हमारे अपने विचार हैं हमारी अपनी सोच है।
अपनों का हर पल यहीं हैं गुज़ारिश हार्दिक अपनों से। अपनों का हर पल यहीं हैं गुज़ारिश हार्दिक अपनों से।
देखना चाहते हैं । जी भर कर बस एक बार , खुले आकाश में , परिन्दों की तरह उड़ान भरना । देखना चाहते हैं । जी भर कर बस एक बार , खुले आकाश में , परिन्दों की तरह ...