संकट तो हैं
संकट तो हैं
संकट तो है
तरह तरह के संकट हैं
देश पर भी
जीवन पर भी
देश में भी
जीवन में भी।
इन संकटों के मूल में है
पहचान का संकट
देश की पहचान का भी
अपनी पहचान का भी।
एक दिलचस्प संयोग ही है कि
देश का संकट और
जीवन का संकट एक सा है
और कोशिश चल रही है
संकट से मुक्ति पाने की
देश भी कोशिश कर रहा है,
और मनुष्य भी कोशिश कर रहा है
हाँ इन कोशिशों पर भी संकट है
यह बात और है कि
देश बोल रहा है,
राजधानियां बोल रही हैं
और मनुष्य चुप है
शायद वो सुन रहा है ढेर सारी
अजनवी सी आवाजें
देश की आवाज
राजधानी की आवाज
और इन आवाजों के बीच मे
संकट से मुक्त होने की आवाज के
विरुद्ध उठती हुयी आवाज।
हर आवाज में मनुष्य होने की आवाज शामिल है
जाहिर है मनुष्य का संकट
उसकी अपनी मनुष्यता का संकट है,
और मनुष्य बाहरी चीजों से इतना प्रभावित है
जैसे कि उसे अपना मनुष्य होना
विस्मृत हो गया है
वो खुद नही समझ पा रहा है कि
उसमें उसकी मनुष्यता कितनी है
जब वह देश की बात बोलता है
जब वह देश पर संकट की बात करता है।
