समय क्या नहीं करता है ?
समय क्या नहीं करता है ?
समय क्या नहीं करता है ?
कभी अच्छे को बुरा
तो कभी बुरे को भी अच्छा बना देता है ।
समय समय पर
बदलती रहती हैं हालातें .
कभी ईमान बिक जाता है
तो कभी सम्मान ।
एक पांडव था - धर्मराज
प्रतिकूल समय हो या युद्ध
मति उसका हमेशा स्थिर रहता
सभी अनुजों और धर्मपत्नी को मृत देख भी
यक्ष के जटिल प्रश्नों का उचित उत्तर
धीर वीर युधिष्ठिर देता ,
पर समय जब विकराल हुआ
गुरु द्रोण के रूप में
सामने खड़ा जब काल हुआ
कुरुक्षेत्र रणभूमि में
पृथ्वी अम्बर साक्षी हैं
उसने भी असत्य कहा ,
यदि असत्य न माने
तो अर्धसत्य कहा ।
हिंसा द्वेष क्रोध मोह छल आदि
सभी दोषों को जीतनेवाला
नियति के अंतिम निर्णय में ,
निर्दोष कहां रहा ?
समय क्या नहीं करता है?
धर्मज्ञ को भी कभी कभी
विवश लाचार बना जाता है।
चलो ठीक है
मनुष्यों को नहीं
प्रकृति पर विचार विमर्श करते हैं ।
गाँव के समीप से गुजरती
मेरी प्यारी महानदी को
बचपन से देखता आ रहा हूँ ,
सूख जाती है गर्मी में तपकर
प्यास बुझाने में असमर्थ ,पर
वर्षा में बाढ़ लाती है
खा जाती है हरी भरी फसलें,
बना बसाया घर ,
मैली हो जाती है पानी
काया उसकी खूब डरावनी
कालसर्प सी फुफकार
चारों ओर जीवन के लिए
शंकित जीवों की हाहाकार ।
लेकिन
शरद के आते ही
हो जाती है पावन ,निर्मल
कलकल करती बहती
सबकी प्यास बुझाती
वक्ष में लिए स्वच्छ शीतल जल ,
बन जाती है अमृत की धारा
माँ की मूरत , स्निग्ध सुकोमल ।
समय क्या नहीं करता है ?
नदी को भी कभी सौम्य - सजीव
तो कभी शुष्क कंकाल बना देता है ,
कभी आह्लादिनी,जीवनदायिनी
तो कभी विकराल बना देता है ।
बंधु ! समय जब भारी होता है
मनुष्य क्या ?
नियति भी चरित्र बदल देता है ।
समय क्या नहीं करता है ?
