स्मरण तेरा
स्मरण तेरा
मेरे नीरव मन की पीड़ा को
क्या कोई जानेगा,
इन नीरव बरसात की रातों में
मैं अपनी अँखियन में नींद लिये ,
तेरे स्मरण में जगकर रात बिताती हूँ
क्या कोई मेरी इस पीड़ा को पहचानेगा ?
कितनी बार प्रभु से विनती करती हूँ
अपना सूना संसार सरस करने को,
पर फिर स्वप्न टूट जाता है
और मैं तेरी याद छुपाए ,
वास्तविक जगत में आती हूँ
तेरी ही स्मृति मन में संजोये।

