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Lakshman Jha

Tragedy


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Lakshman Jha

Tragedy


" समापक "

" समापक "

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दवा नहीं, डॉक्टर नहीं, बिस्तर नहीं,

लोग अपनी जान धोते जा रहे हैं !

मातम सारे देश में ही फैल गया हैं,

अपने भी तो पराए होते जा रहे हैं !!


आक्सिजन की किल्लत यहाँ पर,

टीके भी मिलना मुश्किल हुआ है !

रास्ते पे हम लावारिस बन गए,

मौत का तांडव यहाँ फैला हुआ है !!


कोरोना का कहर जब सुसुप्त था,

घंटियाँ, थालियाँ ढोल बजाये गये !

विजय के गान सारे विश्व में ही,

हम रोज सबको बारबार सुनाने लगे !!


दिग्भ्रमित करके लोगों की चाहत,

नए संसद के लिए खर्च किया !

“आयुष्मान भारत“ चोला सबको,

बिना अनुदान से पहना दिया !! 


“ राम राज्य “ की चाहत में हम,

कैसे हम सपनों का महल बनाएंगे !

हम कुछ क्षण भले ही मौन रहें पर,

इतिहास में “ समापक ” कहलाएंगे !!


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