सखी काहे का बसंत
सखी काहे का बसंत
सखी काहे का बसंत
मोरे प्रियतम परदेश बसे हैं
नही है मोरे संग
सखी काहे का बसंत ।।
सखी काहे का बसंत ।।
जिनके पिया सखी साथ मे
उनका है सखी प्रिय बसंत
मोरे पिया परदेश बसे
मोरा काहे का बसंत ।।
सखी काहे का बसंत ।।
दिनु बीता है राह निहारत
राति कटै नहि बिनु पिया संग
केहि के लिए श्रंगार करु
जब पिया नही मोरे संग ।।
सखी काहे का बसंत ।।
किससे मन की बात कहूँ सखी
जब नही पिया मोरे संग
मै प्यासी बिनु पिय के
नही हिलोर करत मोरे अंग ।।
सखी काहे का बसंत ।।
रह रह याद सतावत सखी
रहा नही एहसास क्या उनको
तड़फत होंगे मोरे अंग
सखी काहे का बसंत ।।
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