शीर्षक =प्रकृति का बदला
शीर्षक =प्रकृति का बदला
जैसे मुद्दतो बाद मुझे गहरी नींद आयी,
पर ये क्या!क्यों थी मैं हस्पताल में लेटी?
आस-पास थे मेरे घरवाले,रिश्तेदार सभी,
चेहरे पर उन सभी के मायूसी थी छायी,
दे रहे थे मुख में नलियों से हवा,पानी,
निष्कर्ष मुझे समझ आ ही गया जल्दी,
जो मुफ़्त में मिला,इज्जत नहीं की कभी।
बुजुर्ग हमारे कहते व्यर्थ ना बहाओ पानी,
बर्तन धोते वक़्त रखो जल की धार धीमी,
पेड़ों में डालो धुले कपड़ो का साफ़ पानी,
अपने स्वार्थ में पेड़ों को मत काटो कभी,
स्वार्थ में उनकी बातों पर गौर किया नहीं,
शायद पता था उन्हेंतभी की भविष्यवाणी
देखना पश्चाताप की आग में जलोगे सभी
प्रकृति ने मानव को हर चीज मुफ्त में दी,
पानी,वायु,पेड़-पौधे,खनिज एवं रोशनी,
नष्ट करने मानव ने कोई कमी रखी नहीं,
देख लो आज बोतल में मिल रहा पानी,
महंगी हुई प्राणवायु हो गयी साँसों से भी
हमारा किया धरा अब भुगतना हैं हमें ही,
तभी धम्म की आवाज से मेरी नींद खुली,
ओह तो सपना था!!मैं थी ज़मीन पर पड़ी
