STORYMIRROR

Kumar Vikrant

Tragedy

4  

Kumar Vikrant

Tragedy

शब्द

शब्द

1 min
371

रोज का वार्तालाप 

कभी लिखे शब्दों से 

कभी बोले लफ्जो से 

ये सिलसिला तेरा मेरा 

मुद्दत से जारी रहा 

क्या मुद्द्त की भी हद होती है? 

होती है शायद 

तभी तो वो हद खत्म हुई 

अब खामोशी का राज है 

तेरे मेरे बीच 

न शब्द तुम्हारे पास बचे है 

न ही मेरे पास बचे है 

क्या शब्दों की भी सीमा होती है?

होती है शायद 

शब्द जो कभी वक्त के मोहताज नहीं थे 

वक्त बेवक्त आते जाते थी 

बिना रोक टोक के 

वक्त के दायरों से शब्द भी न बच सके 

समय का घेरा संकरा होता गया 

शब्द घुटते रहे

मरते रहे 

अब न शब्द है 

न समय का घेरा है 

एक बड़ा सा शून्य है 

जिसके इस पार भी सन्नाटा है 

उस पार भी अंतहीन सन्नाटा है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy