STORYMIRROR

Kumar Vikrant

Drama

4  

Kumar Vikrant

Drama

रंगशाला

रंगशाला

1 min
263

दिन का आरम्भ होते ही 

सज गई है आभासी रंगशाला 

नर्तक भी है 

नर्तकी भी

गवईया भी है 

बजैया भी 

विदूषक भी है 

भाट भी 


झुर्रियों भरे चेहरे लिए 

इठला रहे 

नर्तक और नर्तकियां 

सुर न ताल 

गा रहे, बजा रहे 

बजैया और गवैया 


रुग्ण हंसी चारो तरफ 

हंस रहे, हंसा रहे 

विदूषक और भाट 

आभासी रंगशाला 

के वादे अनोखे 

इरादे अनोखे 


तारीफ अनोखी 

निंदा अनोखी 

क्या सच है क्या झूठ 

न कोई जानता 

न जानने की इच्छा 

बस एक ही सत्य है 


ये है आभासी रंगशाला 

यहाँ 

नर्तक भी है 

नर्तकी भी

गवईया भी है 

बजैया भी 

विदूषक भी है 

भाट भी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama