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Rajiv Jiya Kumar

Romance

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Rajiv Jiya Kumar

Romance

शाम ढले

शाम ढले

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शाम ढले

वजूद पर मेेेरे

ईक साँँस थिरकती है

यह तुम हो सनम 

यह तुम हो सनम

धङकन गुनगुन करती है,

शाम ढले,शाम ढले।।


ईक ख्वाब हो तुम 

जो मैने सजाए 

तन्हा तन्हा रातो में,

ईक साज हो तुम 

खनक उठते हो

दिल की हर बातो में,

शाम ढले,शाम ढले।।


मैं मग्न भी हूँ

हैरां भी हूँ

हुस्न तेरा ईक नशा

जो सिर चढी है,

आगोश में सिमट 

तेरे थम रह जाए 

प्यस यह परवान चढी है,

शाम ढले, शाम ढले

धङकन गुनगुन करती है।

                



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