सच कहूं
सच कहूं
इन अधरों पर
जो मुस्कान खेलती है
वो असल नहीं
बल्कि नक़ल है
उन धुंधली यादों की
जो मासूम बचपन में
कहीं पीछे छूट गई या
हमारा बड़प्पन उन्हें
कहीं पीछे स्वयं छोड़ आया
क्या फर्क पड़ता है
किसको इतनी फुर्सत है
लेकिन जब वक़्त थमेगा
और यह स्वार्थ सिद्धि की
लालसा में मुंदी हुई आंखे
अपने बन्द चक्षुओं को
खोलेगी तो यकीनन
वही धुंधली यादों का
माझी अपने खोये हुए
दरीचों में इन्हें ला पटकेगा
काश! यह उस वक़्त को
देख सके और संजो सके
उन पलों को जिन्हें
इन्होंने अपने जीने की दौड़ में
एक दूसरे को पछाड़ने की हौड़ में
बिल्कुल मुर्दा कर दिया
उन रिश्तों को फिर से
प्राणवान ज्ञानवान और अर्थवान
बना सके जो व्यवसायीकरण का
एक अटूट अंग बनते जा रहे है
और अपना असल वज़ूद
मिटाते हुए सब खोखला बना रहे है
तुम अकेले कसूरवार नहीं
मैं भी तुम्हारा उतना ही दोषी हूँ
जितने कि तुम मेरे
बस हम अपने-अपने में
कहीं गुम हुए
एक दूसरे को
सामने देखते हुए भी
जाने क्यों अनदेखा कर रहे है
अभी भी वक़्त है
तुम मेरा हाथ पकड़ लो
जकड़ लो फिर से मुझे
उन्ही मासूम बचपन के
अधिकार और अपनेपन के साथ
और मैं भी शांत गम्भीर न रहकर
फिर वही अटखेलियां करता हुआ
छतों की मुंडेर पर
पतंग लुटता पेड़ो पर चढ़कर
राहगीरों को तकता और
अमवा के बाग से
माली की नजरें बचाकर
तुम्हारे लिए आम जुटाने का
जतन करता हुआ
लौट आऊंगा फिर उसी
मासूमियत के साथ
तुम्हारे लिए अपने लिए
और सच कहूं तो
हमारे लिए......
