STORYMIRROR

Amit Kumar

Abstract

3  

Amit Kumar

Abstract

मैं

मैं

1 min
209

उसने आज इक़रार कर लिया

किसी से प्यार हो गया है

काश! वो किसी से....

मैं ही रहा होता।

मैं अनजान नही था

बना दिया गया हूँ

किसी जान-पहचान की ख़ातिर

वो पहचानने वाले जो

आधार रहे है मेरी खुशियों का

अब मैं उनकी आफ़त में जान बन गया हूँ

काश! यह आधार यह आफ़त यह जान

मैं उनकी न रहा होता!

वो दुआओं में रब से

जाने क्या मांगते हैं ?

मैं उन्हीं की मुस्कुराहट

मांगता हूँ अपने रब से

जो मिलना तय है हमकों

दोस्तों मुक़द्दर है अपना

हम कर्मों का फिर क्यों 

सिला मांगते है ?

वो दुआएँ वो मुस्कुराहट

वो मुक़द्दर काश! 

मैं ही रहा होता।

  


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract