STORYMIRROR

Manju Rani

Tragedy Classics Inspirational

4  

Manju Rani

Tragedy Classics Inspirational

साँस

साँस

1 min
240

साँस तो चलती है

कभी टेढ़ी-मेढ़ी संकीर्ण गलियों में

कभी सीधे- साधे रास्तों पर

साँस तो चलती है।


कभी दुःख- सुख के चटकारे लेती हुई

कभी राग- द्वेष के स्वाद

कभी प्रेम आनंदमय रस पीती हुई

साँस तो चलती है।

कभी सुहावनी सुबह में


कभी कड़कती धूप में

कभी बारिश के पानी में

साँस तो चलती है।


जन्म से मृत्यु तक

सुबह से शाम तक

आज से कल तक

बस साँस ही तो चलती है।


तेरा मेरा करती हुई

अपने पराए कहती हुई

दोस्त दुश्मन बनाती हुई

साँस ही तो चलती है।


मुस्कुराती हुई

ठाहके लगाती हुई

अपने खेल खेलती हुई

सबको नाच नचाती हुई

साँस ही तो चलती है।


इस के रुकते ही सब रुक जाता है

खेल खत्म हो जाता है

यह सब खेल है साँसों का

तभी तो कहते हैं

साँस तो चलती है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy