STORYMIRROR

Asmita prashant Pushpanjali

Tragedy

3  

Asmita prashant Pushpanjali

Tragedy

साहित्य

साहित्य

1 min
418

साहित्य जैसा ही

हाल कुछ है साहित्यिकों का

पैसे के माप पर

बिकता है हुनर फनकार का


लगती है यहाँ बोलियां

रंडी जैसा ही हाल है

जिसके जेब में हो ढेर पैसा

कला उसकी कलासार है


बड़े बड़े शब्दों के बोझ तले

सिसकियाँ भर रही यहाँ कलमकारी

डिग्रीयों के भार पे

तुल रही है आज फनकारी

मोल नहीं रहा जज्बातोंको

क्या हो रही है पेशकश ?


जो फेंके पैसा,

उसे मिल रहा है भुषण

साहित्य बन चला है मंडी का धंधा

दलाल बन वो खाये पैसा

जिसे मोल नहीं कला की

जिसके खून में रंग नहीं कला का।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy