खुशियों में डर
खुशियों में डर
आज फिर ढेरों मिठाइयां आई हैं,
किसी परिवार ने खुशियों में भिजवाई हैं।
आज फिर किसी मां बाप का जन्म हुआ है,
जैसे बरसों पहले हमारा हुआ था।
आज फिर उन्होंने लाखों सपने बुनें होंगे,
जैसे वर्षों पहले हमने बुना था।
दुआओं से नवजात की झोली भर रहे होंगे,
उसे खुशियों भरा जीवन देने की तैयारी में होंगे।
जिस प्रकार सब मुश्किलें हमने झेली थी,
उस बच्चे के लिए सब वो भी सह लेंगे।
दुआ नवजात से ज्यादा उसके मां बाप के लिए है,
काश! उनकी लाखों दुआएं कुबूल हो जाए।
हमारी तरह बस उनकी किस्मत न ख़राब हो,
बुढ़ापे में वो इस वृद्धाश्रम में आने से बच जाए।
काश ! वो शिशु भी जीवन की ऊंचाइयों पर पहुंचे,
बस ऊंचाई पर पहुंच कर जड़े न भूल जाए।
जिंदगी का अनुभव ही इतना कड़वा रहा है कि,
दुआ यही है सब इस कड़वाहट से बच जाएं।
जिनको हमने ही जिंदगी से रूबरू कराया है,
वही हमें अपनी जिंदगी से निकाल देते हैं।
आज हमारे लिए उनके पास वक्त ही नहीं है,
जिनको वक्त की अहमियत हम ही सिखाते हैं।
