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Vikas Sharma

Tragedy

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Vikas Sharma

Tragedy

शहर-ए-इश्क़ में

शहर-ए-इश्क़ में

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शहर-ए-इश्क़ में, हम हुस्न को आने नहीं देते

मगर तुम ज़िंदगी हो, तुमको दिल कैसे नहीं देते।


लुटाते, नाचती औरत पे, जो नोटों के बंडल को

किसी भी बे-सहारे को, वो दो पैसे नहीं देते।


कराते रोज़ ही शॉपिंग, जो अपनी दिलरूबा को, वो

बरस में इक दफा मां-बाप को कपड़े नहीं देते।


उन्हें तो सब्र का भी फल, कभी मीठा नहीं लगता

जो अमिया तोड़ लेते हैं, उसे पकने नहीं देते।


चुनें हम ख़्वाब की ईंटें, मुकद्दर के महल में, पर

पसीने का कभी सीमेंट हम लगने नहीं देते।


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