STORYMIRROR

Vigyan Prakash

Tragedy

4  

Vigyan Prakash

Tragedy

कुत्तों का शत्रु

कुत्तों का शत्रु

1 min
253

एक सुबह आयी 

उसकी मौत की खबर 

अखबार के साथ 

एक पल को झिझका 

दूजे पल अखबार को भींचे 

बढ़ा उसके आजीवन

निर्द्वन्द रहे आवास की ओर 

जहाँ सोते थे कई सितारे

उसके साथ 

और चाँद दिया करता था

पहरा सारी रात। 


वहाँ पहुँचने पे देखा 

एक मैं ही नहीं था

संवेदना से लिप्त 

कई और भी थे

जिन्हें काम से

फ़ुरसत थी। 


पता चला 

पेट कई दिनों से खाली था 

शायद पीठ से मिलने 

पीछे जा चुका था 

तलवे सूखी धरती के

प्रतिबिम्ब जान पड़ते थे 

लकीरों ने अजीब आकृतियाँ

बना रखी थी हर ओर 


इसी बीच ठंडी हवाओं के

थपेड़ों ने अपनी चाल चली

और काली स्याह रात में

गली के कुत्तों ने खो दिया 

अपना सबसे बड़ा शत्रु। 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy