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Sonal Bhatia Randhawa

Tragedy

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Sonal Bhatia Randhawa

Tragedy

एक गृहिनी की व्यथा

एक गृहिनी की व्यथा

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दिन भर घर में अकेली

ना कोई संग सहेली

तुम तो सुबह चले गए

घर के काम भी निबट गए।


शाम का इंतज़ार हूँ करती

तुम आओ तो बात हूँ करती

आओगे तो पूछोगे शायद

क्या तुम दिन भर हो करती।


पर जब चाय पीते पीते

कुछ कहना मैं हूँ चाहती

तो कह देते हो झट से तुम

थक गया हूँ चुप हो जाओ तुम।


एक हाथ में मोबाइल लिए

बैठ गए फिर टी वी के आगे

और मैं भी साथ में बैठी

मन में कितनी गाँठे बांधे।


किस के सामने गाँठे खोलूँ

किस को अपने दिल की बोलूँ

चुप रहना ही क्या मेरी क़िस्मत

कोई तो हो मेरी मेरी बनिस्बत।


शादी से पहले ज़्यादा ना बोलो

शादी के बाद भी मुँह ना खोलो

बच्चे भी बड़े हो कर कह देते

चुप रहो माँ इतना ना बोलो।


कोई बता दे फिर मुझको

मैं कैसे दिल का हाल कहूँ

तुम से भी ना कुछ बोलूँ तो

फिर मैं किससे अपनी बात कहूँ।


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