रोटी की महक--दो शब्द
रोटी की महक--दो शब्द
वह मन ही मन कुड़मकुड़ाते हुए
कथरी को हटा कर अपने टूटते बदन से
जो तीन दिन से रहा था ताप मे दहक-
अपनी जिंदगानी का क्या है
बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में
लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी
तभी तो आयेगी रोटी की महक-
ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं से आती हुई खिलखिलाकर हंसने की आवाजें-
कौन सुनता है झोपड़ियों से आती हुई आहें-
हे प्रभू, ज्येष्ठ की तपती धूप में-
कुछ कनकी बटोर कर लायी थी सेठानी के शव पर फेंके गयी थी जो सूप में-
आज शायद कुछ तृप्ति पाकर भोजन कणों की
मुरझाती हुई बिटिया शायद जाये चहक-
अपनी जिंदगानी का क्या है
बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में
लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी
तभी तो आयेगी रोटी की महक-
मजदूर, मजबूर और यह मजबूरी
क्या क्या न कराये शायद बहुत कम है-
सूखे हुए होंठ, हड्डियों का ढांचा हुई देह और सूखी आंखें नम है-
अब बेचने के लिए कुछ नहीं है
अभी कुछ दिनो पहले ही देह बेच कर आयी थी-
तभी बच्चों को क्या पता जो मजे से उन्होंने रोटियां खाईं थी
उनकी उसने क्या कीमत चुकाई थी-
इसलिये तो दुनिया में अक्सर लोग
पेट की खातिर जानें - अनजाने जाते हैं बहक-
अपनी जिंदगानी का क्या है
बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में
लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी
तभी तो आयेगी रोटी की महक-
ये सूख गये अब तो आंसू भी नमकीन से-
कितने दिन बैठेंगे दिल को जला कर गमगीन से-
मरता क्या न करता
जर्जर शरीर और टूटी चरमराई खाट से-
बारिश में पानी की बौछारें कहां रूकती हैं छप्पर-ठाठ से-
अक्सर कांपते अधरों से-
कभी पसीने, कभी दर्दों और कभी टूटते बदनों से-
आती है दो रोटी की कसक-
अपनी जिंदगानी का क्या है
बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में
लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी
तभी तो आयेगी रोटी की महक!
