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Rajeev Rawat

Tragedy

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Rajeev Rawat

Tragedy

रोटी की महक--दो शब्द

रोटी की महक--दो शब्द

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वह मन ही मन कुड़मकुड़ाते हुए

कथरी को हटा कर अपने टूटते बदन से

जो तीन दिन से रहा था ताप मे दहक-

अपनी जिंदगानी का क्या है

बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में

लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी

तभी तो आयेगी रोटी की महक-

ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं से आती हुई खिलखिलाकर हंसने की आवाजें-

कौन सुनता है झोपड़ियों से आती हुई आहें-

हे प्रभू, ज्येष्ठ की तपती धूप में-

कुछ कनकी बटोर कर लायी थी सेठानी के शव पर फेंके गयी थी जो सूप में-

आज शायद कुछ तृप्ति पाकर भोजन कणों की

मुरझाती हुई बिटिया शायद जाये चहक-

अपनी जिंदगानी का क्या है

बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में

लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी

तभी तो आयेगी रोटी की महक-

मजदूर, मजबूर और यह मजबूरी

क्या क्या न कराये शायद बहुत कम है-

सूखे हुए होंठ, हड्डियों का ढांचा हुई देह और सूखी आंखें नम है-

अब बेचने के लिए कुछ नहीं है

अभी कुछ दिनो पहले ही देह बेच कर आयी थी-

तभी बच्चों को क्या पता जो मजे से उन्होंने रोटियां खाईं थी

उनकी उसने क्या कीमत चुकाई थी-

इसलिये तो दुनिया में अक्सर लोग 

पेट की खातिर जानें - अनजाने जाते हैं बहक-

अपनी जिंदगानी का क्या है

बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में

लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी

तभी तो आयेगी रोटी की महक-

ये सूख गये अब तो आंसू भी नमकीन से-

कितने दिन बैठेंगे दिल को जला कर गमगीन से-

मरता क्या न करता

जर्जर शरीर और टूटी चरमराई खाट से-

बारिश में पानी की बौछारें कहां रूकती हैं छप्पर-ठाठ से-

अक्सर कांपते अधरों से-

कभी पसीने, कभी दर्दों और कभी टूटते बदनों से-

आती है दो रोटी की कसक-

अपनी जिंदगानी का क्या है

बच्चों के भूखे पेट में, सूखते हुए बंजर खेत में

लगी कुछ फसल में डालना था दाना- पानी

तभी तो आयेगी रोटी की महक!


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