रे मन
रे मन
गीत
रे मन! तुम भी तो अर्जुन हो, एक बार तो हारे हो ।
युद्ध-क्षेत्र में तो अपनों पर, मन की दौलत वारे हो ।।
देख धूर्तता भी छोड़े सब, दंड नहीं तुम देते हो ।
भ्रष्टाचारी रिश्तों से भी, नेह-भाव ही सेते हो ।।
प्रीत सदा ही क्यों खोजे मन, क्यों सोचे तुम प्यारे हो ।
युद्ध-क्षेत्र में तो अपनों पर,मन की दौलत वारे हो ।।
दंडित करने से सिसके मन, पाप आत्मा झेले है ।
पापी तो बस नादां उर से, बार-बार ही खेले है।।
बन जा पाहन-सा अब उर से, मौन- शब्द जब धारे हो।
युद्ध-क्षेत्र में तो अपनों पर, मन की दौलत वारे हो ।।
उन कर्तव्यों से मत भागो, कर्म राह जो आते हैं ।
पहन मुखौटे संबंधी के, ये अपने भरमाते हैं।।
कर्म-योग पथ ही अपनाओ, क्या तुम खड़े विचारे हो ।
युद्ध-क्षेत्र में तो अपनों पर, मन की दौलत वारे हो।।
