सुरसरिता
सुरसरिता
1 min
321
और क्यों न तुम्हें सुरसरिता कहूँ।
नीले नभ की अविरलता को
चीरते हुए किसी योगिनी-सी
क्षिति पर उतर जो रही हो ।
और क्यों न तुम्हें विष्णुपदी कहूँ।
स्पर्श किया जिसने श्री हरि पगको..
साधे एक ही लक्ष्य 'मोक्ष '
इस कर्म की धरती पर
युग-युग से बहती ही रही हो।
द्वार खोलती मुक्ति का तुम ..
राह दिखाती परमात्मा का तुम ..
धन्य धन्य है काशी नगरी ..
संग शिवा भक्तों को तरती ही रही हो।
