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S Ram Verma

Tragedy

4  

S Ram Verma

Tragedy

रात की कालिमा !

रात की कालिमा !

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क्यों रात की ये कालिमा है , 

क्यों किरणों से तपता दिन है।


क्यों आँखों से आसमां ओझल है , 

क्यों हवाएँ सूखी और मद्धम है।


क्यों ये लम्हें दर-दर बिखरे है ,

क्यों यादों के प्रतिबिंब धुँधले है।  


क्यों आहें कराहें हो रही है ,

क्यों दिन बीत ही नहीं रहे है।


क्यों एक नई सुबह की ख़्वाहिश है ,

क्यों अब चुप रहना भी मुश्किल है।


क्यों अब अकेले चलते रहना भारी है , 

क्यों भटके-भटके से ये पदचिन्ह है।


क्यों अब सारी तस्वीरें चुभती सी है ,

क्यों सिमट रहा जीवन प्रतिदिन है।


क्यों एक सिर्फ तेरे साथ ना होने से 

कितने कुछ पर क्यों लग रहा है !  


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