STORYMIRROR

Bhavna Thaker

Tragedy

4  

Bhavna Thaker

Tragedy

रात का मंज़र

रात का मंज़र

1 min
416

कहीं जिस्म बेचा जाता है कहीं इमान खरीदा जाता है,

काली अंधेरी रात की आड़ में न जानें क्या-क्या बिकता रहता है...


चैनों करार को ड़सती रात अपने आँचल में न जाने कितने राज़ छिपाते हंसती है,

न कुछ कहती है ना ही चुप रहती है...


सन्नाटों से लिपटी एकाकी रात आहिस्ता-आहिस्ता ढ़ल रही होती है तब,

फूटपाथ के उस पार से भूख से बिलखते जठरों के भीतर से शोर उठता है... 


थकान से निढ़ाल सोई माँ के पहलू से बच्चे को दूर फेंकते शराबियों की वासना

अर्धांगनी के तन को निचोड़ते हाँफ रही होती है...


किसी कोठे के कोने में कई मासूम अबलाओं के अंग से

उतरते पहरन शर्मा कर सिसकते रो रहे होते है...  


इश्क के नाम पर न जानें कितनी बुद्धुओं की इज्जत उतरती है,

जिस्मफ़रोशी का घिनौना चेहरा रात की कोख से ही पैदा होता है...  


कान लगाकर सुनना स्याही रात के सहारे पनपते

असंख्य करतूतों की चीखों से चारों दिशाएं सुबकती सिमट रही होती है...


मजदूरों के पसीने से टपकती बूँदों से उठती पीड़ का आगम

मशीनों की चहचहाती टंकार के नीचे दब रहा होता है... 


हाईवे पर मद्धम गति से रेंगते वाहनों के भीतर अवैध

गतिविधियों से उठती चिंगारियों को कोई तो बुझाओ...


ये रात का मंज़र शांत कहाँ होता है, उठता है कितना ज़हरिला धुआँ

जिसमें भुनभुनाते कई ज़िंदगियां कोहराम में बदलती रहती है.


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy