रात, बारिश और तुम
रात, बारिश और तुम
हर रात की तरह
कल रात भी होती गर
बारिश ना होती और
फिर वहीं कुछ
भीगीं सी तुम्हारी यादे,
मेरे दिल पर हौले से
यूँ दस्तक़ ना देती।
हर रात की तरह
ये रात भी, गुजर ही जाती
और बिना आवाज़ के
कुछ अश्क़ भी तकिये तले
छुप ही जाते गर
तेरे एहसास ने
मेरे हाथों को, हौले से
यूँ छूकर, मेरी धड़कन
ना बढ़ाई होती।
हर रात की तरह
ये रात भी गुज़र ही जाती,
गर, बंद लबों ने मेरे
तेरा नाम ना बुदबुदाया होता
तो यूँ तन्हाई में इस क़दर
ना फिर रुसवाई होती।
हर रात की तरह
कल रात भी गुज़र ही जाती।
जो बारिश ने यूँ आँखें मेरी
ना भिगोई होती।
हर रात सी ये
रात भी गुज़र ही जाती
गर तेरी याद फिर से यूँ
ना क़रीब आई होती।
