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Rooh Lost_Soul

Tragedy

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Rooh Lost_Soul

Tragedy

चाहती हूँ...

चाहती हूँ...

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चाहती हूँ कुछ पल को तेरे सीने में

अब दफ़न हो जाना ।

कि अब और नही भीग सकती मैं

अपने ही अश्कों में।


चाहती हूँ गीली रेत पर तेरे संग नंगे पाँव 

कुछ और क़दम चलना ।

कि अब और नहीं चीख सकती मैं

अपनी ही ख़ामोशी में।


चाहती हूँ खुले आसमान में तेरे संग

हर शब तारो को गिनना ।

कि अब और नही चल सकती

अपने ही ख़्यालों में।


हाँ माना मैं बहुत कुछ चाहती हूँ..

 मगर

कि अब और नहीं उलझ सकती 

अपने ही सवालों में....


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