STORYMIRROR

Ganesh Chandra kestwal

Classics

5  

Ganesh Chandra kestwal

Classics

राम रघुकुल दिवाकर

राम रघुकुल दिवाकर

1 min
419


घनश्याम तन पर पीत-पट शुभ अति मनोहर राजता।

सिर पर मुकुट नव कांतिमय नित हेम का है साजता।

कुंडल तिलक श्री राम जी के चित्त सबके मोहते ।

कोदंड खर शर हस्त में प्रभु विश्व तारक सोहते॥१॥


श्री राम रघुकुल के दिवाकर दीप्त जीवन कीजिए। 

मम मार्ग से हर विघ्न को निज बाण से हर लीजिए।

छवि नव मनोहर धारकर प्रभु वास उर में कीजिए ।

अब दीन-वत्सल हे कृपानिधि! निज कृपा शुभ दीजिए॥२॥


उद्धार प्रभु नारी अहिल्या तव चरण-रज से हुई ।

वपु-वेदना खग गिद्ध की सब प्रभु दयामय से गई। 

सुग्रीव निष्कासित हुआ था शक्ति तुमने दी नई। 

निज मित्र उसको है बनाया भीति उसकी बल भई॥३॥


हे दुःख-भंजन! चित्तरंजन!चित्त की बाधा हरो ।

सुखधाम जग के पूर्ण हो तुम मम सुखी जीवन करो। 

निज उर धरूँ प्रिय रूप अनुपम आप मुझको पग धरो ।

तुम हो चराचर विश्व अधिपति नित्य मम हिय में चरो।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics