प्यार पे दुनिया कायम
प्यार पे दुनिया कायम
चलो सुनाऊँ आज एक
अनोखी प्रेम कहानी
बादल पृथ्वी का दिवाना
वह तो रवीराजा की रानी
मगर यह सूरज अपनी जोगन को
हाय कितना तरसावे
दिवानी बनके झूमे पृथ्वी
वह तपती आग बरसावे
विरह की पीड़ा में
बरसकर बेहद रोए
धराधर अपने अश्कों से
धरा को बार बार छूए
कसम से बादल सा महबूब
आज तक नहीं देखा
दिल के गम को उसने
सनम की हँसी बना के रखा
हरे रंग की सारी में
लागे सुंदरता की मूरत
बरसात की पहली छींटों से
खिल उठे सूरत
सावन की बुँदों ने
भले ही उसको महका दिया
मगर धराराणी के दिल को
एक तारे ने बहका दिया
उसके किरणों की छुवन से
पृथ्वी का मन मचल जाए
उस झील में पलभर डूब के
वह अगले ही पल संभल जाए
बताओ क्या कहे इसको
यह मोहब्बत नहीं हैं अगर
सूरज के तेज की चमक
छलके वसुंधरा के चेहरे पर
उसके कोमल किरणों में
वह अपनी सुबह जी लेती हैं
जब सिर पे चढ़ जाता हैं वह
तो तपती आग भी पी लेती हैं
मगर यह शामे धरती को
बडा बेजार करती हैं
प्रेमी को उसके
नैनों के पार करती हैं
ढलते हुए दिनकर को पृथ्वी
बड़े प्यार से निहारती हैं
शांत ज्वाला रवी की मानो
आरती उसकी उतारती हैं
जुदा हो जब सुरज से
आँसू न उसका थमा जाए
त्याग कर रोशनी का
वह खुद भी अँधेरे में समा जाए
फिर चाँद-तारों संग करती बातें
रात्री के प्रहर में
पूछे पिया का हाल पृथ्वी
स्नेह भरे से स्वर में
जो अपनी राह चल दे रात
मिट जाए उसकी तन्हाईयाँ
पंछी मधूर धून में सुनाए
रवीराजा के आगमन की शहनाईयाँ
खिलकर फूल खुशी से
धरती को देते बधाईयाँ
मिट रही होती हैं जब
आँखो - आँखों की जुदाईयाँ
जुड़ी सुरज संग ऐसे धरा
जैसे कान्हा को पूजे मीरा
हाथ नहीं हाथों में मगर
नम आँखों में चमके प्रीत का हिरा
करोड़ों की दुरी दोनों में
मगर रिश्ता देखो कितना गहरा हैं
युगोयुगों से मार्ग पृथ्वी का
सुरज के बाजू ठहरा हैं
सुनी होगी बचपन में
न जाने कितनी कहानियाँ
गौर करो इस कहानी पर
जिस पर चलती हैं दुनिया
पर न जाने क्यूँ इसमें हम
देखते सिर्फ भुगोल हैं
थोड़ा झाँक लो उसके भितर
जानोगे प्यार का क्या मोल हैं
जितना विपुल यह विश्व है
उतना विशाल यह इश्क है
यूँ ही तो नहीं यादें किसी की
देती बरसों बाद भी अश्क है
प्यार पे दुनिया कायम है
यह बात जो सुनी सुनाई है।
बादल - पृथ्वी - रवी का मेल
बतलाता ईसकी गहराई हैं

