प्यार की किताब
प्यार की किताब
तुम मुझे किताब सी लगती हो
जितना पढ़ता हूँ तुम्हें कम लगती हो
बात जितनी सीधी उतनी लगती नहीं
जब तुम आँखों से सवाल करती हो
तुम्हारा मैं जवाब दूँ तो क्या दूँ
तुम मुझे ला-जवाब करती हो
जितना पढ़ता हूँ तुम्हें कम लगता है
ख़्याल में मेरी रातों को सुबह करती हो
तुम मुझे किताब सी लगती हो
दर्द बन जाओगे तो मुश्किल होगी
तुम मुझे संगदिल लगती हो
यह रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं
तुम क़रीब से ज्यादा क़रीब लगती हो
तुम्हारी हर अदा पर मरता हूँ
शायद तुम भी गुनाह करती हो
तुम्हें याद करना गुनाह से कम नहीं
जब भी मिलती हो कमाल करती हो
तुम मुझे किताब सी लगती हो
जितना पढ़ता हूं तुम्हें कम लगती हो
आँखों की खिड़कियों से ज़रा
झांक कर तो देख
कितने लोगों का प्यार से क़त्ल करती हो
मैं तुम्हारी तमन्ना में मरा जा रहा हूँ
तुम कभी ना मिलने को दावा करती हो
तुम मुझे किताब सी लगती हो
जितना पढ़ता हूँ तुम्हें कम लगती हो।

