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Prabhatt mishra

Tragedy Classics

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Prabhatt mishra

Tragedy Classics

पुरुष

पुरुष

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जहॉ तक जाती हैं,
 मेरी नजर
सब माया हैं,
सब हैं नश्वर 
सब रह जाने वाला हैं यही ,
चाहे व्यक्ति हो,
वस्तु हो या हो जीव,
यह भी निश्चित नहीं,
 की कब ?
 फिर भी,
 खोज़ रहा हूँ,
 वैभव , पद,
विलास के साधन ,
मित्र , शत्रु
और तटस्थ ,
कर रहा
निज अहंकार तुष्ट ,
पर कब तक ?
क्या पता
किस रात्रि की सुबह नहीं,
किस दिन
ढलता सूर्य नहीं दिख पायेगा ,
फिर भी
नहीं झुकाता शीश
किसी के सम्मुख ,
लड़ रहा,
हर द्वंद अकेला
अपने ही सुर में गाता
वेदना से विदिर्ण
हैं गात,
रंच मात्र
शेष नहीं स्थान
फिर भी
हंसता
व्यंग से दृष्ट
जैसे कोई क्रूर
आक्रांता, संवेदनाहीन ,
मन ही मन हूँ
व्यथित,
परंतु,
रो नहीं सकता
क्योकि
मैं हूँ
एक पुरुष


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