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Prabhatt mishra

Abstract

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Prabhatt mishra

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यह कैसा नववर्ष

यह कैसा नववर्ष

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यह कैसा नववर्ष हैं ?

हाँड़ कपाती ठंडी फैली
मन में भरा अमर्ष हैं 
पतझड़ सी ऋतु आयी
लुप्त हुआ सब हर्ष हैं 

यह कैसा नववर्ष हैं ?

कोहरे की चादर पसरी
घर की हर डगर बिसरी
सुप्त पड़े जीवन में 
अग्नि का विमर्श हैं 

यह कैसा नववर्ष हैं  ?

वृक्षों पर न नयी कोपल हैं
न लतायें हुयी चंचल हैं
सूर्य हैं विलुप्त हुआ 
गोधुली सा हर पल हैं 

यह कैसा नववर्ष हैं ?


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