यह कैसा नववर्ष
यह कैसा नववर्ष
यह कैसा नववर्ष हैं ?
हाँड़ कपाती ठंडी फैली
मन में भरा अमर्ष हैं
पतझड़ सी ऋतु आयी
लुप्त हुआ सब हर्ष हैं
यह कैसा नववर्ष हैं ?
कोहरे की चादर पसरी
घर की हर डगर बिसरी
सुप्त पड़े जीवन में
अग्नि का विमर्श हैं
यह कैसा नववर्ष हैं ?
वृक्षों पर न नयी कोपल हैं
न लतायें हुयी चंचल हैं
सूर्य हैं विलुप्त हुआ
गोधुली सा हर पल हैं
यह कैसा नववर्ष हैं ?
