पश्मीना से ख्वाब
पश्मीना से ख्वाब
सर्द रातों की देह पर उगते है ,
पश्मीना से गर्म अहसास
हवा धकेल के ... दरवाज़ा
आ जाती है घर में,
कभी तुम भी .....
यूँ ही आया -जाया करो."
कभी पिघलते ....कभी जलते ,
कभी खामोश ही रहते है.....
ये दहकते हुऐ ... अलाव ,
बुझा देते तो ... अच्छा था ,
सर्दियों की रात में ,
वही तेरा सिंदूरी एहसास ....
हल्का सा कुहासा ओढ़े ,
लिपट रही है तेरी याद ,
जिस्म से मेरे ... लिहाफ़ की तरह !!

