प्रतीक्षा
प्रतीक्षा
गाय ने मुझ से शिकायत की
अब गृहिणी मुझे रोटी
खिलाती नहीं
बाल्टी भर पानी पिलाती नहीं
पीठ मेरी थपथपाती नहीं
मुझे सहलाती नहीं।
पुरुषों के पास तो
पहले भी कहां फुर्सत थी
महिलाएं ही हमें प्यार जताती थीं।
मैंने उसे समझाया
गृहिणियां बीते दिनों की
हो गई है प्रजाति।
अब वे हैं आफिसर
टीचर
क्लर्क
वर्कर
होम मेकर
और भी न जाने क्या क्या
उसका और उसके
परिवार का खाना ही आता है
होटल या ढाबे से
तुम्हारे लिए फुर्सत कहां है।
वैसे भी
बदलते समय के साथ
संवेदना हो गई है
अब अर्थहीन।
तुम जाओ
किसी गन्दगी के ढेर से
जुगाड़ करो।
वहां तो पोलीथन बैगज़ का
अम्बार लगा है
छोटे बड़े हर प्रकार के।
ढेरों ढेर चले जाएंगे
मेरे अन्दर
ब्लॉक हो जाएंगी
सब नस नाड़ियां
मर जाऊंगी मैं।
अच्छा है
दो चार गाय मरेंगी
कोई न कोई एन जी ओ गायों की रक्षा की शपथ लेगा।
प्रतीक्षा करो,
सरकार भी कोई न कोई
मुहिम चलाएगी।
तुम्हारा बलिदान,
दूसरी गायों का रक्षा कवच बनेगा।
