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अर्चना राज चौबे

Romance

4  

अर्चना राज चौबे

Romance

प्रेम

प्रेम

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मुमकिन है 

कुछ सालों बाद तुम समझ पाओ 

कि रेशम भी छीजता है 

नदी भी टूटती है 

और बदरंग होती है हल्दी की गाँठ भी ,


अगरबत्तियां झड़ जाती हैं 

कुरेद कर लिखे नामो में सीलन भर जाती है 

काली हो जाती हैं सुंदर आँखें 

उँगलियाँ सख्त हो जाती हैं 


मुमकिन है 

तुम कहो उसे वक्त की बदमिजाजी 

कहो चश्मे को बदला हुआ 

या समझ की तस्वीर को धुंधला कहो ,


ये सब कहा जाना बेकार है मेरे हमनफ़स 

कि टूटने के बाद आइना खुद का नहीं होता 

कि टूटने के बाद बेशक चेहरे भी कई हो जाते हैं 

पर भूलना मत कि वो तकसीम भी हो जाते हैं ,


भुलावों पर प्रेम नहीं टिकता 

तुम चाहो तब पर भी नहीं!


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