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अर्चना राज चौबे

Abstract

4.2  

अर्चना राज चौबे

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एकरसता

एकरसता

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277


बहुत खाली हूँ भीतर से थका मन है 

भला कैसा ये मौसम और ये मौसम की उलझन है 

लिपटकर सर्दियां जो रात की साथी हुयींं अतीत है 


तपाकर धूप भी यादों में जो पिघली कभी वो अतीत है 

सुना था बारिशें लाती हैं कुछ भूले तो

कुछ भीगे हुये लम्हों को वापस झूठ है पर 

कि सब झूठे यहां पर, 


चल यूं ही सही ऐ वक्त तेरा दांव देखेंगे 

तू मुझको आजमाना हम भी तुझको आजमायेंगे, 


मुसलसल जिंदगी हर रोज इक किस्से सी आती है 

लुभाती है उबाती है 

पकड़ कर राह फिर अपनी यहां से

धीरे-धीरे लम्हा-लम्हा दूर जाती है 

कि दिन यूं ही मेरा कटता है अक्सर मेरी ड्योढ़ी में।


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