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अर्चना राज चौबे

Abstract

3  

अर्चना राज चौबे

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पीड़ा

पीड़ा

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पीड़ा प्रतिपल रचती राग 

रीता मन 

शोक मगन 

धरा हो विचलित 

जीवन घन 


स्मृति जैसे वीणा के तार 

मौन हृदय 

अतुलित भार 

अश्रु हो विगलित 

शून्य आधार


गति निरंतर 

भीगा अंतर 

फिर फिर पीड़ा 

फिर फिर अश्रु 

फिर फिर मौन।


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