STORYMIRROR

अर्चना राज चौबे

Abstract

3  

अर्चना राज चौबे

Abstract

पीड़ा

पीड़ा

1 min
245

पीड़ा प्रतिपल रचती राग 

रीता मन 

शोक मगन 

धरा हो विचलित 

जीवन घन 


स्मृति जैसे वीणा के तार 

मौन हृदय 

अतुलित भार 

अश्रु हो विगलित 

शून्य आधार


गति निरंतर 

भीगा अंतर 

फिर फिर पीड़ा 

फिर फिर अश्रु 

फिर फिर मौन।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract